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Wednesday, 29 April 2020

कोरोना का रायता और दर्द अपना-अपना-6

हाथों की खुजली हो गई लॉक

रायपुर.  सरकारी बाबू और थाने का हवलदार दो ऐसे असरदार किरदार हैं, जिनका हर मौसम में जलवा रहता है। साहब कोई भी हो, लेकिन सिक्का इनका ही चलता है। इनके आगे बड़े-बड़े तुर्रम खां भी दंडवत हो जाते हैं। और ये दोनों केवल लक्ष्मीजी के आगे दंडवत होते हैं। साहब या थानेदार के कमरे में आने वाले हर शख्स को इनकी पैनी नजर पहचान लेती है कि कौन लक्ष्मीजी का वाहक है और कौन नहीं? उन्हें देखते ही इनकी हाथों में खुजली होने लगती है। दरअसल हमारी संस्कृति में कई लोग हाथों में खुजली होने को पैसा आने का संकेत मानते हैं। बाबू और हवलदार भी उन्हीं बिरादरी से हैं। सीट में आते ही उनके हाथों में खुजली शुरू हो जाती है। मजाल है कि इनकी खुजली मिटाए बिना अपना कोई काम करवा ले। छत्तीसगढ़ क्या पूरे भारत में संभव नहीं। लेकिन कोरोना संक्रमण रोकने लगे लॉकडाउन से इनकी हाथों की खुजली भी बंद हो गई है। खुजली बंद होते ही इनका दर्द बढ़ गया है। आखिर दर्द अपना-अपना है, लेकिन समझेगा कौन?
घर का हजम नहीं हो रहा
एक सरकारी बाबू काफी परेशान हैं। लॉकडाउन के बाद से उन्हें बदहजमी की समस्या शुरू हो गई। घर का जो भी खाते-पीते हैं, उन्हें हजम नहीं होता। सुबह का चाय-नाश्ता किसी तरह हजम कर लेते हैं, लेकिन दोपहर से रात तक का कुछ भी हजम नहीं हो रहा है। घरवाले उनकी परेशानी समझ नहीं रहे हैं, लेकिन बाबू अच्छी तरह जानता है कि ऐसा क्यों हो रहा है। दरअसल बाबू का डाइजेशन सिस्टम विभाग में काम के सिलसिले में आने वाले लोगों के हिसाब से ढल गया है। जिस स्तर के काम होते हैं, उसी स्तर का चाय-काफी, नाश्ता और खर्चापानी का इंतजाम हो जाता था। कभी-कभी तो दोपहर का भोजन और शाम के दो पैग का इंतजाम भी हो जाता था। इससे डाइजेशन सिस्टम काफी स्ट्रांग हो गया था। अब घर में केवल हल्की चीजें खाने-पीने को मिल रही है। सबकुछ घरेलू है, जिसे उनका डाइजेशन सिस्टम झेल नहीं पा रहा है।
आंखों से चमक गायब
थाने में जब भी कोई फरियादी आता है, तो उसे देखते ही कुछ हवलदारों की आंखों में खुशी की चमक आ जाता है। आरोपी और फरियादी कोई भी रहे हवलदार को उनकी लेखनशैली का असर एफआईआर से लेकर चालान बनाने तक रहता है। इसका इनाम भी उन तक चलकर आता है। पिछले कई दिनों से ऐसे हवलदारों के आंखों में खुशी वाली चमक नहीं दिखी। ऐसे हवलदार भी हैं, जिनकी नजर फरियादियों की तलाश में हमेशा थाने के मुख्यद्वार पर लगी रहती थी, लेकिन अब वही नजरें वाट्सएप और यूट्यूब से चिपकी रहती है।
साहब से ज्यादा फूर्ति
सरकारी विभाग में साहब से ज्यादा बाबू असरदार और फुर्तिला होता है। खुजली मिटा दो तो अपने साहब से भी ज्यादा फूर्ति से काम निपटा देता है। कई बार तो बाबू ही साहब का पूरा काम कर देते हैं। केवल चिडिय़ा साहब बैठाते हैं। हाथों में खुजली बंद है, तो फूर्ति भी नहीं रही। ऑफिस खुलेगी, तो हाथों की खुजली लौटेगी। और खुजली मिटेगी, तो फूर्ति लौटेगी। 

Thursday, 23 April 2020

कोरोना का रायता और दर्द अपना-अपना-5


बस्तर की असल तस्वीर जमलो

जमलो मड़कम 
रायपुर   भारत अब डिजीटल इंडिया बन गया है। इस डिजीटल इंडिया में भूख-प्यास, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में 12 साल की बालिका की मौत होना 21वीं सदी की बड़ी त्रासदी है। यह घटना विकास के नाम पर लोगों से छलावा का बड़ा उदाहरण है। यह घटना भारत माता के उन कथित देशभक्तों की आंखें खोलने के लिए भी काफी है, जो बात-बात पर अपनी राष्ट्रभक्ति का ढिंढोरा पीटते रहते हैं। बस्तर की बेटी जमलो मड़काम ने भूख-प्यास और गरीबी के चलते दम तोड़ दिया। यह  बताता है कि  पिछले दो दशक में बस्तर की तस्वीर केवल सरकारी आंकड़ों में बदली है। असलियत कुछ और ही है। जमलो की मौत ने वह असलियत उजागर कर दी है। जिन परिस्थितियों ने जमलो को मौत दी है, वैसी परिस्थितियां बस्तर के अधिकांश हिस्सों में है। लेकिन इसमें बदलाव नहीं हो रहा है। इसके चलते नई पीढ़ी के जमलो को भी असमय मौत देखना पड़ा है।   इसका मतलब  साफ  है  कि बस्तर की दशा  आज भी  नहीं बदली है।  वहां जीना कठिन और मौत आसान है।  चाहे मौत माओवादियों  से  मिले   या  मौसमी  बीमारी  से   या  फिर गरीबी, भूखमरी  और बेरोजगारी   के  चलते  हो। 
बस्तर की असल तस्वीर जमलो
जमलो के पिता 
जमलो मड़काम की मौत ने बस्तर की असल तस्वीर पेश की है, जो पिछले कई सदियों से वैसी की वैसी है। उसमें कोई बदलाव नहीं आया है। वही भूख-प्यास और गरीबी, अशिक्षा व बुनियादी सुविधाओं का अभाव। 21वीं सदी में भूख-प्यास, बेरोजगारी, गरीबी और सुविधाओं की भारी कमी से किसी की मौत हो जाना, नेताओं के विकास के   दावों की पोल खोलता है। बस्तर के ग्रामीण इलाकों में आज भी बेरोजगारी, शिक्षा की कमी और बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। बच्चे, बूढ़े और महिलाएं इसकी भेंट चढ़ रहे हैं। सरकारों का  अंधापन इसे क्यों देख नहीं  पा रहा है या जानबूझकर  अनदेखा किया जा रहा है।    इन इलाकों  के  लिए  अलग अलग  प्राधिकरण बना कर  हर साल करोड़ों रूपए का बजट जारी  किया  जाता   है।   इस  राशि का शतप्रतिशत   उपयोग  अगर बस्तरवासियो  के  लिए होता   ,  तो  जमलो जैसीं   नई  पीढ़ी  को अपनी जान नहीं गवानी  पड़ती  । 
कौन है जमलो
बीजापुर के ग्राम आदेड़ निवासी 12 साल की जमलो मड़कम। गरीबी के चलते कच्ची उम्र में ही जमलो को काम करना पड़ता था। फरवरी में जमलो अपने रिश्तेदारों के साथ तेलांगना के पेरूर गांव में मिर्ची तोडऩे चली गई। उसे करीब 100 रुपए रोजी दिया जाता था। कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए लॉकडाउन की घोषणा हो गई। पेरूर में काम बंद हो गया। सभी मजदूरों के साथ जमलो भी वहीं रह गई। कुछ दिन तक तो खाने-पीने के लिए मिलता रहा। इसके बाद भूखों मरने की नौबत आ गई। सभी मजदूरों ने बीजापुर लौटने का निर्णय लिया। लेकिन लॉकडाउन के चलते ठेकेदार ने मजदूरों को गांव तक पहुंचाने से इनकार कर दिया। सभी पैदल ही गांव लौटने लगे। पेरूर से बीजापुर 200 किमी से अधिक दूर है। इतने दूर पैदल जाना बालिका जमलो के लिए संभव नहीं था, लेकिन मजबूरी में उसे भी आना पड़ा। सभी जंगल के रास्ते लौट रहे थे। लगातार तीन दिन तक पैदल चलने के बाद 20 अप्रैल को जमलो की तबीयत खराब हो गई। उसके शरीर में पानी की भारी कमी हो गई। खाना भी ढंग से नहीं मिला। इसके चलते अपने घर से महज 14 किमी की दूरी पर जमलो ने दम तोड़ दिया। बताया जाता है कि बच्ची की मौत पानी और भोजन की कमी के चलते हो गई। https://raipurkegothbaat.blogspot.com/2020/04/corona-covid-19.html
गरीबी की भेंट चढ़ा बचपन
जमलो के आने का इंतजार कर रहे पिता आंदोराम मड़कम और मां सुकमति को जैसे ही यह खबर मिली, उनका रो-रोकर बुराहाल था। उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गरीबी के चलते ही जमलो को तेलांगना जाना पड़ा। जमलो का बचपन गरीबी की भेंट चढ़ चुका था। जमलो की तरह कई बच्चे कामधंधों में लगे हैं। दरअसल बीजापुर सहित आसपास के इलाकों में ठेकेदार सक्रिय रहते हैं। मजदूरों को अपने साथ तेलांगाना, आंध्रप्रदेश आदि स्थानों में काम कराने ले जाते हैं। और उन्हें वापस भी छोडऩे का इंतजाम करते हैं।
मनरेगा का लाभ नहीं
ग्रामीणों के मुताबिक बीजापुर सहित बस्तर के अधिकांश स्थानों पर मनरेगा के काम ठप पड़े हैं। कुछ स्थानों पर काम चलता भी है, तो मजदूरी समय पर नहीं मिलती। खेती-किसानी बहुत सीमित है। लिहाजा ग्रामीणों को तेलांगना, आंध्रप्रदेश जैसे दूसरे राज्यों में काम करने जाना पड़ता है। जिला प्रशासन भी मनरेगा के काम को लेकर गंभीर नहीं है। खेती-किसानी को प्रोत्साहन देने वाली योजनाएं भी दम तोड़ रही है। गरीबी और बेरोजगारी के चलते लोगों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। यही वजह है कि जमलो जैसे कई बच्चों को रोजीरोटी के लिए कोसों दूर पैदल चलना पड़ रहा है। आखिर रोजीरोटी के लिए इतना लंबा सफर कब खत्म होगा? जंगल के कई हिस्सों में माओवादी सक्रिय हैं, जिससे वनोपज संग्रहण करना मुश्किल होता है। उन्नत खेती-किसानी केवल एक सपना है। जमलो जैसे कई बच्चों और उनके परिजनों का असली दर्द बेरोजगारी,  गरीबी  और   आभवग्रस्त  जिंदगी है। 

Tuesday, 7 April 2020

कोरोना का रायता और दर्द अपना-अपना-4

नेता भैया और नए उगे समाज सेवक


अपने अंदर छुपी प्रतिभा को उभारने का अवसर हर इंसान को मि
लता है। कुछ कर्मवीर तो सूखे में भी कुंआ खोदकर नदिया बहा देते हैं। ऐसी प्रतिभा केवल नेताओं और नेतानुमा लोगों में ही पाई जाती है। मौका कोई भी हो। खुशी हो या दुख का, उसे एक सुनहरे अवसर के रूप में बदल लेते हैं। इसमें वे महारत होते हैं। अब कोरोना वॉयरस संक्रमण से बने हालात को ही ले लीजिए। लोग वॉयरस से संक्रमित भले नहीं हैं, लेकिन मानसिक और आर्थिक क्षति के चलते शारीरिक क्षति की ओर बढ़ रहे हैं। इस मुश्किल घड़ी ने भी नेता भैया और नेतानुमा भैया को सुनहरा अवसर दे दिया है। मदद के बहाने सुबह-शाम घरों और मोहल्लों में पहुंच रहे हैं। लोगों के हमदर्द बनकर। नेता भैया और नेतानुमा भैया ने अपने निठल्ले चमचों को भी इसी काम में लगा दिया है। निठल्ले सुबह से उठते हैं और घूम-घूमकर लॉकडाउन के साइड इफैक्ट से पीडि़त गरीबों को ढूढ़ते हैं, ताकि उनकी कुछ मदद करते हुए अगले दिन अखबारों में नेता भैया का चेहरा चमक जाए। या किसी अपरिपक्व इलेक्ट्रानिक-वेबपोर्टल में दिख जाए।
सेवाभाव की क्रांति..
लॉकडाउन के बाद शहर में नेता भैया और नेतानुमा भैया के अलावा बड़ी संख्या में समाज सेवक उग आए हैं, जिन्हें किसी तरह की वैचारिक, सांस्कृतिक खाद नहीं मिली है। केवल मौका देखा और उग आए। शहर में इन दिनों इतने समाज सेवक दिख रहे हैं कि जरूरतमंदों और गरीबों का टोटा हो गया है। जिधर देखो
उधर समाज सेवक सामान बांटने के लिए घूमता नजर आ रहा है। नेता भैया और नेतानुमा भैया के साथ इतने सारे समाज सेवक सक्रिय हैं, मानो सेवाभाव की क्रांति आ गई है।
फोटो खींचवाना जरूरी
नेता भैया, नेतानुमा भैया और अभी-अभी उगे समाज सेवक अपने चेले चपाटियों के साथ आठ-दस लोगों का भोजन, पानी, मास्क, राशन जो भी सस्ता हो, लेकर निकलते हैं। और किसी मोहल्ले में जो भी मिल जाए, उन्हें बांटते हैं। सामान बांटते हुए फोटो जरूर खींचवाते हैं। फोटो खिंचवाते तक वितरण जारी रहता है, जैसे ही फोटो सेशन खत्म होता है। धीरे से वितरण कार्यक्रम भी समाप्त हो जाता है।
दो नेता भैया में कॉम्पीटिशन
लॉकडाउन के चलते नेता भैयाओं में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने और सेवा भाव दिखाने की होड़ लग गई है। सभी ने अपने निठल्लों को इसी काम में लगा दिया है। कोई नेता भैया नगदी दान कर रहा है, तो कोई राशन, तो कोई कुछ और। सभी को चिंता है कि कोई उससे आगे न निकल जाए। रायपुर के थोड़ा पुराने नेता भैया और कुछ दिन पहले बड़े नेता बने नेता भैया में जबरदस्त काम्पीटिशन चल रहा है। एक नेताभैया अपने इलाके में सक्रिय है, तो दूसरा नेता भैया पूरे रायपुर में घूम रहे हैं। दोनों में एक बात समान है कि दोनों फोटो अच्छा खिंचवाते हैं।
यहां क्यों नहीं करते ??? 
शहर की कई कॉलोनी, बस्ती और मोहल्लों में ऐसे लोग हैं, जिनके पास कोई राशन कार्ड नहीं है और रोज कमाते हैं, तब उनके घर चूल्हा जलता है। हर वार्ड में ऐसे सैकड़ों लोग हैं। क्या उन घरों में राशन पहुंच रहा है? क्यों उनके घर कोई बीमार है? हर पार्षद अपने इलाके में घूम-घूमकर यह देख सकता है और उनकी मदद कर सकता है।
अब दर्द की बात
जिस तरह से नेता भैया, नेतानुमा भैया और नए उगे समाज सेवक सक्रिय हो गए हैं, उससे सोशल डिस्टेंसिंग का मैनेजमेंट गड़बड़ा गया है। ऐसा न हो कि मदद के चक्कर में कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ जाए। प्रशासन का दर्द है कि इन नेता भैया और नेतानुमा भैया को कैसे सोशल डिस्टेंसिंग समझाएं? नए उगे समाज सेवकों को तो एक बार समझा भी सकते हैं, लेकिन असली दर्द तो नेता और नेतानुमा भैया की है। उनका क्या किया जाए?

Sunday, 5 April 2020

कोरोना का रायता और दर्द अपना-अपना-3

मयखानों की खामोश दहाड़...और हिल गई सरकार


धर्मग्रंथ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादरियों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।
कालजयी रचना मधुशाला की इन पंक्तियों में डा. हरिवंश राय बच्चन ने मदिरालाय आने वालों को धार्मिंक बंधनों से मुक्त बताया है। सही भी है। मयखाने में आने वाला जैसे ही दो पैग गले से नीचे से उतारता है, वह जाति-धर्म विहीन हो जाता है। उसके अंदर से ज्ञान की गंगा बहने लगती है। और कुछ लोगों के ज्ञान की गंगा को उलटी दिशा में भी बहने लगती है। खैर इस विषय पर लंबी चर्चा हो सकती है। हम बच्चन साहब की मधुशाला को पकड़ते हैं। मधुशाला की तरह सरकारें भी मयखानों को हर बंदिशों-नियमों से दूर रखना चाहती है। चाहे लॉकडाउन जैसे हालात ही क्यों न हो। यह मदिराप्रेमियों के दारू के प्रति अथाह प्रेम का ही नतीजा है। सरकार इस प्रेम का दिल खोलकर सम्मान करना चाहती है। और जुगाड़ में लगी भी है कि लॉकडाउन खत्म होने से पहले ही सूने पड़े मदिरालाय आबाद हो जाए। गुलजार हो जाए। 
खामोश दहाड़...
किसी व्यवस्था को बंद या शुरू कराने के लिए लोगों को काफी शोर मचाना पड़ता है। उनकी आवाज सड़क से लेकर संसद तक गूंजती है। तब कुछ बदलाव हो पाता है, लेकिन हमारा प्रदेश इतिहास रचने की तैयारी में है। लॉकडाउन में शराब दुकानें खोलने की तैयारी है। यह एक बदलाव है। यह बदलाव शोर, हंगामे की वजह से नहीं बल्कि एक खामोशी

Friday, 3 April 2020

कोरोना का रायता और दर्द अपना-अपना-2


देशी स्टाइल


पुलिस विभाग का अनुशासन और खिदमतगिरी को दूसरे विभागों के लिए नजीर के तौर पर पेश की जाती है। इसकी वजह भी है। पुलिस विभाग में अनुशासन और खिदमतगिरी नीचे से ऊपर की ओर ही चलती है। ऊपर से नीचे कभी नहीं आती। ऊपर से केवल फरमान आते हैं। फरमान भी ऐसा कि चित भी बड़े साहब का और पट भी उन्हीं का। 
कोरोना वॉयरस संक्रमण से विदेश के बाद अब देश भी झुलसने लगा है। हमारा शहर भी इससे अछूता नहीं रहा। कोरोना संक्रमण से बचाने किए गए उपायों के तहत कुछ दिन पहले जारी एक फरमान ने शहर के कई थानेदारों का सुखचैन छिन लिया है। सुबह से देर शाम तक उसके पालन में सिर खपाते हैं। पूरी मानसिक और शारीरिक क्षमता लगाने के बाद शाम होते-होते इलाका सामान्य हो जाता है। अगले दिन फिर वही नजारा रहता है। सड़कों पर तितर-बितर आते-जाते लोग। इन्हें देखकर थानेदारों का पारा चढ़ जाता है। कुछ थानेदारों के हाथों में तो खुजली तक होने लगती है। अफसोस उनको खुजली मिटाने का मौका नहीं मिल पाता। ऐसा पिछले कई दिनों से चल रहा है।
आइये इस दर्द में थोड़ा और आगे बढ़ते हैं।
दरअसल जारी हुए फरमान का निचोड़ यह है कि लोगों में सोशल डिस्टेंस बढ़ाना और बेवजह सड़कों पर तफरीह करने वालों की संख्या घटाना है। पहले वाले को बढ़ाना और दूसरे वाले को घटाना हमारे रायपुर वाले अपनी तौहिन से कम नहीं समझते हैं। रायपुर वाले काफी सोशली अटैचड हैं और तफरीह करने में भी आगे हैं। चाहे उसका कारण हो या अकारण। भाई लोग कहीं भी निकल पड़ते हैं।

ऐसे न थे बड़े साहब

सब जनता कफ्र्यू का किया धरा है। प्रधानमंत्रीजी के ओजस्वी भाषण और अपील का असर पुलिस विभाग में जोरदार हुआ। दूसरी ओर जनता कफ्र्यू खत्म होने की खुशी में अगले दिन जनता भी दोगुनी फुर्ति से सड़कों में निकल पड़ी। यह देखकर बड़े साहब को प्रधानमंत्रीजी का शतप्रतिशत लॉकडाउन याद आ गया। उन्होंने एक असरदार फरमान जारी किया। फिर क्या था। उस दिन छोटे साहब, मध्यम साहब, थानेदार सभी ने मिलकर देशी स्टाइल का ऐसा प्रदर्शन किया कि रायपुर वालों की सोशल डिस्टेंसिंग बढ़ गई और तफरीह की आदत भी ठिकाने लग गई। देशी स्टाइल की गूंज नेतानगरी में होने लगी। इसका असर यह हुआ कि अचानक बड़े साहब ने धीरे से दूसरा फरमान जारी कर दिया। इसमें कहा गया कि देशी स्टाइल का प्रदर्शन किए बिना रायपुर वालों की सोशल डिस्टेंसिंग बढ़ाना और तफरीह घटाना है।

दर्द की दवा क्या है?

जैसे ही अगले दिन पुलिस ने देशी स्टाइल बंद किया रायपुर वाले फिर अपने स्टाइल में आ गए। सोशल अटैचमेंट भी बढ़ा लिया और तफरीह भी क
रने लगे। सोशल अटैचमेंट इतना बढ़ा लिया कि अपने घर में सब्जी की जरूरत नहीं है, तो पड़ोसी के लिए खरीदने निकल पड़े। तफरीह का चस्का ऐसा कि सब्जी या राशन अपने मोहल्ले में उपलब्ध है, फिर भी दूसरे इलाके में जा रहे हैं।
अब थानेदारों का दर्द है कि बिना देशी स्टाइल के कैसे सोशल डिस्टेंसिंग बढ़ाया जाए? कैसे सड़कों में भीड़भाड़ कम किया जाए.....????

Wednesday, 1 April 2020

कोरोना का रायता और दर्द अपना-अपना-1

खुशी का मौका हो या तकलीफ का समय किसी न किसी रूप में पुलिस की उपस्थिति बन ही जाती है। फिलहाल देश-प्रदेश में कोरोना की तकलीफ है। तकलीफ का समय है, तो पुलिस की उपस्थिति लाजिमी है। इस तकलीफ के जन्म से लेकर रोकथाम तक पुलिस का दूर-दूर तक लेना-देना नहीं है, फिर भी मैदान में पुलिस ऐसे डटी है, जैसे सबकुछ उसी का किया धरा है। और अब उसी को सुधारना है। लगता है कि कोरोना को फैलने से रोकने की जिम्मेदारी पुलिस के सिर पर ही है। कोरोना के रायता को फैलने से रोकने सब जुटे हुए हैं, लेकिन सबका अपना-अपना दर्द है। आज एक सिपाही का दर्द देखते हैं।

राजधानी रायपुर का हृदयस्थल जयस्तंभ चौक। लॉकडाउन वाला दिन। अचानक वॉयरलेस से पाइंट चला कि शहर में भीड़ बढ़ रही है। इसे नियंत्रित करना है। अनान-फानन में की गई व्यवस्था के तहत एक सिपाही भी अपने साथियों के साथ में चौक पर तैनात हुआ। साहब के आदेशानुसार उसे हर दोपहिया, चौपहिया वालों को रोकना और अनावश्यक होने पर उन्हें वापस उनके घर भेजना है।
चौक में एक कार वाला
पहुंचा। कार में तीन लोग सवार थे। एक अधेड़ और दो युवा। सिपाही ने उनसे विनम्रता से पूछता है कि-आप लोग बाहर क्यों निकले हो? शहर में धारा-144-1 लगा है और लॉकडाउन भी है। आप लोग घर चले चले जाएं। सिपाही के सवाल पर अधेड़ थोड़ा घबराया। फिर तपाक से जवाब दिया कि घर में पत्नी बीमार हैं। उसकी दवाई लेने जा रहा हूं। वह पर्ची भी दिखाया। पर्ची देखकर सिपाही ने कहा-आप दवा लेने जा रहे हैं, लेकिन साथ में ये दो लोग क्यों हैं? सिपाही के प्रश्न का उसके पास कोई जवाब नहीं था। बोला-रिश्तेदार हैं। साथ आ गए। यह सुनकर सिपाही ने नाराजगी जाहिर करते हुए घर वापस जाने के लिए कहा। फिर मेडिकल की पर्ची देखकर जाने दिया, लेकिन इससे पहले कोरोना संक्रमण से बचने और सावधानी बरतने की चेतावनी भी दी।
कुछ देर बाद बाइक सवार दो युवक पहुंचे। चलाने वाले ने हेलमेट पहन रखा था, लेकिन चेहरे पर मास्क नहीं लगाया था। सिपाही ने दोनों से बाहर निकलने का कारण पूछा। बाइक चलाने वाले ने कहा-राशन लेने जा रहे हैं। सिपाही-मास्क क्यों नहीं लगाए हो? बाइक चालक-भूल गया। यहीं पास में सामान खरीदना है। इसलिए नहीं लगाया। यह सुनकर सिपाही ने उन्हें भी कोरोना संक्रमण और कानून व्यवस्था याद दिलाया। युवक उसकी बात को गंभीरता से नहीं ले रहे थे। सिपाही यह भांप गया। इससे उसे गुस्सा भी आया, लेकिन उसने दोनों युवकों को राशन लेने के बाद सीधे घर जाने की हिदायत देकर जाने दिया।
चौक में आवाजाही बढ़ रही थी। इधर अफसरों का वॉयरलेस सेट में लोगों को उनके घर वापस भेजने के लिए लगातार मैसेज चल रहा था। इस बीच सिपाही को यूरीन जाने की जरूरत महसूस हुई। चौक से कुछ सार्वजनिक यूरीनल था। उसे चेकिंग छोड़कर थोड़ा दूर जाना पड़ता। चौक से गुजरने वाले वाहनों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। सिपाही के दूसरे साथी अकेले संभाल नहीं पा रहे थे। सिपाही ने थोड़ी देर यूरीन को कंट्रोल करने का निर्णय लिया। और वाहनों को रोकने में लगा रहा।
इस बीच चौक में एक और कार पहुंची। कार चलाने वाला सफेद कुर्ता-पायजामा पहना था। चेहरे पर हल्की दाढ़ी-मंूछ थी। हुलिए से किसी राजनीतिक दल का अनियंत्रित कार्यकर्ता लग रहा था। उनके साथ तीन और लोग थे। सिपाही ने उनसे विनम्रता से पूछा-कहां जा रहे हैं? कार चालक ने अकड़कर कहा-टाटीबंध। सिपाही-क्यों जा रहे हैं? कार चालक-थोड़ा काम है। सिपाही-क्या काम है? कार चालक थोड़ा और अकड़ते हुए-बस कुछ काम है। दूसरी बार भी एक जैसा जवाब और उनकी अकड़ देखकर सिपाही का दिमाग गर्म होने लगा। उसने कहा कि कोरोना वॉयरस के संक्रमण से बचने पुलिस ने धारा-144-1 लगाया है और लॉकडाउन भी है। ऐसे में बिना जरूरी काम के नहीं निकल सकते। आप लोगों पर कार्रवाई हो सकती है। सिपाही की बात सुनकर कार में बैठे तीन अन्य लोग रौब झाड़ते हुए कहने लगे कि-अरे भाई हमें मत बताओ कानून। हम लोग पार्टी से हैं। टाटीबंध में कुछ लोगों को खाना खिलाने जा रहे हैं? ज्यादा है, तो आपके साहब से बात करा दूं? यह सुनकर सिपाही की जुबान तो शांत हो गई, लेकिन दिमाग का टेंपरेचर और बढ़ गया। और उसके मन में ख्याल आया कि क्यों न इन चारों को कानून का लाठी वाला पाठ पढ़ाया जाए। फिर चंद सेकंड में ही सिपाही अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आया और उन अनियंत्रित कार्यकर्ताओं को मुस्कुराते हुए विदा किया।
चौक में वाहनों की आवाजाही थोड़ी कम होने लगी, तो सिपाही अपने साथी सिपाही को इशारा करके मूत्रालय की ओर बढऩे लगा। इस बीच दूर से कुछ गाडिय़ां फिर आती दिखीं, तो सिपाही को देखते हुए उसके ऊपर वाले साहब ने जोर से आवाज लगाई। अरे गाडिय़ां आ रही हैं। इन्हें रोको और वापस भेजो। सालों की आज ही बारात निकल रही है। साहब का आदेश कानों में गूंजते ही सिपाही यूरीन जाना भूल गया और आधे रास्ते से दौड़कर फिर पाइंट पर पहुंच गया। अब सिपाही के दिमाग में दो बातें घूमने लगी। पहला यूरीन को कैसे रोकूं और दूसरी बात धारा 144-1 और लॉकडाउन होने के बाद भी पढ़े-लिखे लोग घर से बाहर क्यों निकल रहे हैं? इनको कैसे रोका जाए?
दिमाग में दो बातें चल ही रही थी कि एक मोपेड सवार एक अधेड़ पहुंचा। सिपाही ने उन्हें रोका और बाहर निकलने का कारण पूछा। मोपेड सवार ने कहा-सब्जी लेने गोलबाजार जा रहा हूं। सिपाही ने कहा-सब्जी किसमें रखोगे? दिखाओ थैला। अधेड़ ने मोपेड की डिक्की खोली। उसमें थैला नहीं था। सिपाही को शक हुआ कि झूठ बोल रहा है। उसने अधेड़ को समझाया कि धारा-144-1 का पालन करें। बेवजह घूमने और भीड़ में जाने से आप कोरोना से संक्रमित हो सकते हैं। इससे आपकी जान को खतरा हो सकता है। यह सुनकर अधेड़ अपनी दांत निकालकर हंसने लगा। साहब आज जाने दो न। कल से सावधानी बरतूंगा। सिपाही ने उसे थोड़ा चमकाया, फिर उसे भी जाने दे दिया।
कार वाले, दोपहिया वाले लगातार आते रहे। सभी कभी मेडिकल, तो कभी सब्जी का बहाना करते रहे। यह देखकर सिपाही का दिमाग गर्म हो चुका था। उसके मन में फिर ख्याल आया कि ये सब पढ़े-लिखे-शिक्षित लोग लातों के भूत हैं, बातों से नहीं मानेंगे। इस बीच भीड़ और बढऩे लगी, तो सिपाही के बड़े साहब का दिमाग भी गर्म हो गया। अब उन्होंने सिपाही को हड़काते हुए कहा कि कुछ भी करों, यहां से कोई गाड़ी वाला नहीं गुजरना चाहिए। सिपाही पहले से अपने दर्द से परेशान था, अब साहब के हड़काने से उसका दर्द और बढ़ गया। फिर क्या था सिपाही ने अपना देशी स्टाइल शुरू कर दिया। जो भी गाड़ी वाला दिखा, उसके पिछवाड़े पर डंडा घुमाना शुरू कर दिया। कुछ ही मिनटों में सिपाही के डंडे की शोर दूसरे चौराहे तक पहुंच गई। लोगों में हल्ला मच गया कि जयस्तंभ चौक से गाड़ी लेकर गुजरने वालों को सिपाही लाल कर रहा है। हल्ला क्या मचा, लोगों ने उधर आना ही छोड़ दिया और थोड़ी देर बाद चौक की ओर वाहनों का आना बंद हो गया। और सिपाही आराम से यूरिन करने जा सका ।
अब क्या होगा? 
ड्यूटी खत्म होने के बाद सिपाही घर पहुंचा। आराम करने लगा। सोने से पहले उसके दिमाग में दिनभर के घटनाक्रम जुड़े दृश्य घूमने लगे। इस दौरान उसने देखा कि लोगों को कोरोना संक्रमण से बचाने वाहन चालकों को वापस भेजते समय वह उन्हें सावधानी बरतने की सलाह दे रहा है, लेकिन ड्यूटी के दौरान वह स्वयं कई चूक कर बैठा है। जैसे गाड़ी पर हाथ लगाना, वाहन चालकों के दस्तावेज देखना, बातचीत के दौरान सोशल डिस्टेसिंग का पालन नहीं कर पाना, मास्क और टोपी को निकालना, बार-बार हाथ को सेनीटाइज नहीं करना आदि...अब उसका क्या होगा?

अंत में एक सवाल...क्या जमीनी स्तर पर तैनात सिपाही जैसे अन्य कर्मियों के दर्द को सभ्य समाज कम कर सकता है???