खुशी का मौका हो या तकलीफ का समय किसी न किसी रूप में पुलिस की उपस्थिति बन ही जाती है। फिलहाल देश-प्रदेश में कोरोना की तकलीफ है। तकलीफ का समय है, तो पुलिस की उपस्थिति लाजिमी है। इस तकलीफ के जन्म से लेकर रोकथाम तक पुलिस का दूर-दूर तक लेना-देना नहीं है, फिर भी मैदान में पुलिस ऐसे डटी है, जैसे सबकुछ उसी का किया धरा है। और अब उसी को सुधारना है। लगता है कि कोरोना को फैलने से रोकने की जिम्मेदारी पुलिस के सिर पर ही है। कोरोना के रायता को फैलने से रोकने सब जुटे हुए हैं, लेकिन सबका अपना-अपना दर्द है। आज एक सिपाही का दर्द देखते हैं।राजधानी रायपुर का हृदयस्थल जयस्तंभ चौक। लॉकडाउन वाला दिन। अचानक वॉयरलेस से पाइंट चला कि शहर में भीड़ बढ़ रही है। इसे नियंत्रित करना है। अनान-फानन में की गई व्यवस्था के तहत एक सिपाही भी अपने साथियों के साथ में चौक पर तैनात हुआ। साहब के आदेशानुसार उसे हर दोपहिया, चौपहिया वालों को रोकना और अनावश्यक होने पर उन्हें वापस उनके घर भेजना है।
चौक में एक कार वाला
पहुंचा। कार में तीन लोग सवार थे। एक अधेड़ और दो युवा। सिपाही ने उनसे विनम्रता से पूछता है कि-आप लोग बाहर क्यों निकले हो? शहर में धारा-144-1 लगा है और लॉकडाउन भी है। आप लोग घर चले चले जाएं। सिपाही के सवाल पर अधेड़ थोड़ा घबराया। फिर तपाक से जवाब दिया कि घर में पत्नी बीमार हैं। उसकी दवाई लेने जा रहा हूं। वह पर्ची भी दिखाया। पर्ची देखकर सिपाही ने कहा-आप दवा लेने जा रहे हैं, लेकिन साथ में ये दो लोग क्यों हैं? सिपाही के प्रश्न का उसके पास कोई जवाब नहीं था। बोला-रिश्तेदार हैं। साथ आ गए। यह सुनकर सिपाही ने नाराजगी जाहिर करते हुए घर वापस जाने के लिए कहा। फिर मेडिकल की पर्ची देखकर जाने दिया, लेकिन इससे पहले कोरोना संक्रमण से बचने और सावधानी बरतने की चेतावनी भी दी।
कुछ देर बाद बाइक सवार दो युवक पहुंचे। चलाने वाले ने हेलमेट पहन रखा था, लेकिन चेहरे पर मास्क नहीं लगाया था। सिपाही ने दोनों से बाहर निकलने का कारण पूछा। बाइक चलाने वाले ने कहा-राशन लेने जा रहे हैं। सिपाही-मास्क क्यों नहीं लगाए हो? बाइक चालक-भूल गया। यहीं पास में सामान खरीदना है। इसलिए नहीं लगाया। यह सुनकर सिपाही ने उन्हें भी कोरोना संक्रमण और कानून व्यवस्था याद दिलाया। युवक उसकी बात को गंभीरता से नहीं ले रहे थे। सिपाही यह भांप गया। इससे उसे गुस्सा भी आया, लेकिन उसने दोनों युवकों को राशन लेने के बाद सीधे घर जाने की हिदायत देकर जाने दिया।
चौक में आवाजाही बढ़ रही थी। इधर अफसरों का वॉयरलेस सेट में लोगों को उनके घर वापस भेजने के लिए लगातार मैसेज चल रहा था। इस बीच सिपाही को यूरीन जाने की जरूरत महसूस हुई। चौक से कुछ सार्वजनिक यूरीनल था। उसे चेकिंग छोड़कर थोड़ा दूर जाना पड़ता। चौक से गुजरने वाले वाहनों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। सिपाही के दूसरे साथी अकेले संभाल नहीं पा रहे थे। सिपाही ने थोड़ी देर यूरीन को कंट्रोल करने का निर्णय लिया। और वाहनों को रोकने में लगा रहा।
इस बीच चौक में एक और कार पहुंची। कार चलाने वाला सफेद कुर्ता-पायजामा पहना था। चेहरे पर हल्की दाढ़ी-मंूछ थी। हुलिए से किसी राजनीतिक दल का अनियंत्रित कार्यकर्ता लग रहा था। उनके साथ तीन और लोग थे। सिपाही ने उनसे विनम्रता से पूछा-कहां जा रहे हैं? कार चालक ने अकड़कर कहा-टाटीबंध। सिपाही-क्यों जा रहे हैं? कार चालक-थोड़ा काम है। सिपाही-क्या काम है? कार चालक थोड़ा और अकड़ते हुए-बस कुछ काम है। दूसरी बार भी एक जैसा जवाब और उनकी अकड़ देखकर सिपाही का दिमाग गर्म होने लगा। उसने कहा कि कोरोना वॉयरस के संक्रमण से बचने पुलिस ने धारा-144-1 लगाया है और लॉकडाउन भी है। ऐसे में बिना जरूरी काम के नहीं निकल सकते। आप लोगों पर कार्रवाई हो सकती है। सिपाही की बात सुनकर कार में बैठे तीन अन्य लोग रौब झाड़ते हुए कहने लगे कि-अरे भाई हमें मत बताओ कानून। हम लोग पार्टी से हैं। टाटीबंध में कुछ लोगों को खाना खिलाने जा रहे हैं? ज्यादा है, तो आपके साहब से बात करा दूं? यह सुनकर सिपाही की जुबान तो शांत हो गई, लेकिन दिमाग का टेंपरेचर और बढ़ गया। और उसके मन में ख्याल आया कि क्यों न इन चारों को कानून का लाठी वाला पाठ पढ़ाया जाए। फिर चंद सेकंड में ही सिपाही अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आया और उन अनियंत्रित कार्यकर्ताओं को मुस्कुराते हुए विदा किया।
चौक में वाहनों की आवाजाही थोड़ी कम होने लगी, तो सिपाही अपने साथी सिपाही को इशारा करके मूत्रालय की ओर बढऩे लगा। इस बीच दूर से कुछ गाडिय़ां फिर आती दिखीं, तो सिपाही को देखते हुए उसके ऊपर वाले साहब ने जोर से आवाज लगाई। अरे गाडिय़ां आ रही हैं। इन्हें रोको और वापस भेजो। सालों की आज ही बारात निकल रही है। साहब का आदेश कानों में गूंजते ही सिपाही यूरीन जाना भूल गया और आधे रास्ते से दौड़कर फिर पाइंट पर पहुंच गया। अब सिपाही के दिमाग में दो बातें घूमने लगी। पहला यूरीन को कैसे रोकूं और दूसरी बात धारा 144-1 और लॉकडाउन होने के बाद भी पढ़े-लिखे लोग घर से बाहर क्यों निकल रहे हैं? इनको कैसे रोका जाए?
दिमाग में दो बातें चल ही रही थी कि एक मोपेड सवार एक अधेड़ पहुंचा। सिपाही ने उन्हें रोका और बाहर निकलने का कारण पूछा। मोपेड सवार ने कहा-सब्जी लेने गोलबाजार जा रहा हूं। सिपाही ने कहा-सब्जी किसमें रखोगे? दिखाओ थैला। अधेड़ ने मोपेड की डिक्की खोली। उसमें थैला नहीं था। सिपाही को शक हुआ कि झूठ बोल रहा है। उसने अधेड़ को समझाया कि धारा-144-1 का पालन करें। बेवजह घूमने और भीड़ में जाने से आप कोरोना से संक्रमित हो सकते हैं। इससे आपकी जान को खतरा हो सकता है। यह सुनकर अधेड़ अपनी दांत निकालकर हंसने लगा। साहब आज जाने दो न। कल से सावधानी बरतूंगा। सिपाही ने उसे थोड़ा चमकाया, फिर उसे भी जाने दे दिया।
कार वाले, दोपहिया वाले लगातार आते रहे। सभी कभी मेडिकल, तो कभी सब्जी का बहाना करते रहे। यह देखकर सिपाही का दिमाग गर्म हो चुका था। उसके मन में फिर ख्याल आया कि ये सब पढ़े-लिखे-शिक्षित लोग लातों के भूत हैं, बातों से नहीं मानेंगे। इस बीच भीड़ और बढऩे लगी, तो सिपाही के बड़े साहब का दिमाग भी गर्म हो गया। अब उन्होंने सिपाही को हड़काते हुए कहा कि कुछ भी करों, यहां से कोई गाड़ी वाला नहीं गुजरना चाहिए। सिपाही पहले से अपने दर्द से परेशान था, अब साहब के हड़काने से उसका दर्द और बढ़ गया। फिर क्या था सिपाही ने अपना देशी स्टाइल शुरू कर दिया। जो भी गाड़ी वाला दिखा, उसके पिछवाड़े पर डंडा घुमाना शुरू कर दिया। कुछ ही मिनटों में सिपाही के डंडे की शोर दूसरे चौराहे तक पहुंच गई। लोगों में हल्ला मच गया कि जयस्तंभ चौक से गाड़ी लेकर गुजरने वालों को सिपाही लाल कर रहा है। हल्ला क्या मचा, लोगों ने उधर आना ही छोड़ दिया और थोड़ी देर बाद चौक की ओर वाहनों का आना बंद हो गया। और सिपाही आराम से यूरिन करने जा सका ।
अब क्या होगा?
ड्यूटी खत्म होने के बाद सिपाही घर पहुंचा। आराम करने लगा। सोने से पहले उसके दिमाग में दिनभर के घटनाक्रम जुड़े दृश्य घूमने लगे। इस दौरान उसने देखा कि लोगों को कोरोना संक्रमण से बचाने वाहन चालकों को वापस भेजते समय वह उन्हें सावधानी बरतने की सलाह दे रहा है, लेकिन ड्यूटी के दौरान वह स्वयं कई चूक कर बैठा है। जैसे गाड़ी पर हाथ लगाना, वाहन चालकों के दस्तावेज देखना, बातचीत के दौरान सोशल डिस्टेसिंग का पालन नहीं कर पाना, मास्क और टोपी को निकालना, बार-बार हाथ को सेनीटाइज नहीं करना आदि...अब उसका क्या होगा?
अंत में एक सवाल...क्या जमीनी स्तर पर तैनात सिपाही जैसे अन्य कर्मियों के दर्द को सभ्य समाज कम कर सकता है???
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