देशी स्टाइल

पुलिस विभाग का अनुशासन और खिदमतगिरी को दूसरे विभागों के लिए नजीर के तौर पर पेश की जाती है। इसकी वजह भी है। पुलिस विभाग में अनुशासन और खिदमतगिरी नीचे से ऊपर की ओर ही चलती है। ऊपर से नीचे कभी नहीं आती। ऊपर से केवल फरमान आते हैं। फरमान भी ऐसा कि चित भी बड़े साहब का और पट भी उन्हीं का।
कोरोना वॉयरस संक्रमण से विदेश के बाद अब देश भी झुलसने लगा है। हमारा शहर भी इससे अछूता नहीं रहा। कोरोना संक्रमण से बचाने किए गए उपायों के तहत कुछ दिन पहले जारी एक फरमान ने शहर के कई थानेदारों का सुखचैन छिन लिया है। सुबह से देर शाम तक उसके पालन में सिर खपाते हैं। पूरी मानसिक और शारीरिक क्षमता लगाने के बाद शाम होते-होते इलाका सामान्य हो जाता है। अगले दिन फिर वही नजारा रहता है। सड़कों पर तितर-बितर आते-जाते लोग। इन्हें देखकर थानेदारों का पारा चढ़ जाता है। कुछ थानेदारों के हाथों में तो खुजली तक होने लगती है। अफसोस उनको खुजली मिटाने का मौका नहीं मिल पाता। ऐसा पिछले कई दिनों से चल रहा है।
आइये इस दर्द में थोड़ा और आगे बढ़ते हैं।
दरअसल जारी हुए फरमान का निचोड़ यह है कि लोगों में सोशल डिस्टेंस बढ़ाना और बेवजह सड़कों पर तफरीह करने वालों की संख्या घटाना है। पहले वाले को बढ़ाना और दूसरे वाले को घटाना हमारे रायपुर वाले अपनी तौहिन से कम नहीं समझते हैं। रायपुर वाले काफी सोशली अटैचड हैं और तफरीह करने में भी आगे हैं। चाहे उसका कारण हो या अकारण। भाई लोग कहीं भी निकल पड़ते हैं।
ऐसे न थे बड़े साहब
सब जनता कफ्र्यू का किया धरा है। प्रधानमंत्रीजी के ओजस्वी भाषण और अपील का असर पुलिस विभाग में जोरदार हुआ। दूसरी ओर जनता कफ्र्यू खत्म होने की खुशी में अगले दिन जनता भी दोगुनी फुर्ति से सड़कों में निकल पड़ी। यह देखकर बड़े साहब को प्रधानमंत्रीजी का शतप्रतिशत लॉकडाउन याद आ गया। उन्होंने एक असरदार फरमान जारी किया। फिर क्या था। उस दिन छोटे साहब, मध्यम साहब, थानेदार सभी ने मिलकर देशी स्टाइल का ऐसा प्रदर्शन किया कि रायपुर वालों की सोशल डिस्टेंसिंग बढ़ गई और तफरीह की आदत भी ठिकाने लग गई। देशी स्टाइल की गूंज नेतानगरी में होने लगी। इसका असर यह हुआ कि अचानक बड़े साहब ने धीरे से दूसरा फरमान जारी कर दिया। इसमें कहा गया कि देशी स्टाइल का प्रदर्शन किए बिना रायपुर वालों की सोशल डिस्टेंसिंग बढ़ाना और तफरीह घटाना है।दर्द की दवा क्या है?
जैसे ही अगले दिन पुलिस ने देशी स्टाइल बंद किया रायपुर वाले फिर अपने स्टाइल में आ गए। सोशल अटैचमेंट भी बढ़ा लिया और तफरीह भी करने लगे। सोशल अटैचमेंट इतना बढ़ा लिया कि अपने घर में सब्जी की जरूरत नहीं है, तो पड़ोसी के लिए खरीदने निकल पड़े। तफरीह का चस्का ऐसा कि सब्जी या राशन अपने मोहल्ले में उपलब्ध है, फिर भी दूसरे इलाके में जा रहे हैं।
अब थानेदारों का दर्द है कि बिना देशी स्टाइल के कैसे सोशल डिस्टेंसिंग बढ़ाया जाए? कैसे सड़कों में भीड़भाड़ कम किया जाए.....????
No comments:
Post a Comment